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श्लोक 3.4.62  |
गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन ।
ताते अनुरागी वाञ्छे आपन मरण ॥62॥ |
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| अनुवाद |
| "जो कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम में है, वह भगवान से वियोग सहन नहीं कर सकता। इसलिए ऐसा भक्त सदैव अपनी मृत्यु की कामना करता है।" |
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| "A person who deeply loves Krishna cannot bear separation from Him. Therefore, such a devotee always desires death." |
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