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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट
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श्लोक 62
श्लोक
3.4.62
गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन ।
ताते अनुरागी वाञ्छे आपन मरण ॥62॥
अनुवाद
"जो कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम में है, वह भगवान से वियोग सहन नहीं कर सकता। इसलिए ऐसा भक्त सदैव अपनी मृत्यु की कामना करता है।"
"A person who deeply loves Krishna cannot bear separation from Him. Therefore, such a devotee always desires death."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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