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श्लोक 3.4.53  |
दिव्य प्रसाद पाय नित्य जगन्नाथ - मन्दिरे ।
ताहा आनि’ नित्य अवश्य देन दोंहाकारे ॥53॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान जगन्नाथ के मंदिर में प्रसाद की पेशकश उच्चतम गुणवत्ता की थी। श्री चैतन्य महाप्रभु इस प्रसाद को लाते थे और इसे दो भक्तों को देते थे। |
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| The offering of prasada (offering) at the Lord Jagannath temple was of the highest order. Sri Chaitanya Mahaprabhu would bring this prasada and give it to both devotees. |
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