श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.4.45 
गोसाञि कहेन, - “एइ - मत मुरारि - गुप्त ।
पूर्वे आमि परीक्षिलुँ तार एइ रीत” ॥45॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मुरारिगुप्त के विषय में भी ऐसी ही घटना घटी थी। पहले मैंने उनकी परीक्षा ली थी, और उनका निश्चय भी ऐसा ही था।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "A similar incident occurred with Murari Gupta. I tested him first, and his resolve was similar."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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