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श्लोक 3.4.41  |
कृपा करि’ मोरे आज्ञा देह’ दुइ - जन ।
जन्मे - जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण ॥41॥ |
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| अनुवाद |
| आप दोनों मुझ पर कृपा करें और मुझे ऐसा आदेश दें कि मैं जन्म-जन्मान्तर तक भगवान रघुनाथ के चरणकमलों की सेवा करता रहूँ। |
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| “You both should be kind to me and give me such orders that I may serve the lotus feet of Lord Raghunath in every birth.” |
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