श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.4.31 
रात्रि - दिने रघुनाथेर ‘नाम’ आर ‘ध्यान’ ।
रामायण निरवधि शुने, करे गान ॥31॥
 
 
अनुवाद
"वे सदैव रघुनाथ के पवित्र नाम का जप और ध्यान करते थे। वे रामायण से भगवान की लीलाओं के बारे में निरंतर सुनते और उनका कीर्तन करते थे।
 
"He always chanted the holy name of Raghunath and meditated on Him. He constantly listened to the Lord's pastimes from the Ramayana and chanted about them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)