श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.4.27 
तोमार भाइ अनुपमेर हैल गङ्गा - प्राप्ति ।
भाल छिल, रघुनाथे दृढ़ तार भक्ति ॥27॥
 
 
अनुवाद
"तुम्हारे भाई अनुपमा अब मर चुके हैं। वह एक बहुत अच्छे भक्त थे और रघुनाथ [भगवान रामचंद्र] में उनकी दृढ़ आस्था थी।"
 
Your brother Anupam is no more. He was a great devotee with unwavering faith in Raghunath (Lord Ramachandra)."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)