श्री - रूप - रघुनाथ - पदे यार आश ।
चैतन्य - चरितामृत कहे कृष्णदास ॥239॥
अनुवाद
श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं, कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन करता हूँ।
Worshiping Srila Rupa and the lotus feet of Sri Raghunath, always seeking His mercy, I, Krishnadasa, am narrating Sri Chaitanya-charitamrita, following in His footsteps.
इस प्रकार श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य लीला, के अंतर्गत चौथा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥