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श्लोक 3.4.237  |
एइ त कहि लुँ पुनः सनातन - सङ्गमे ।
प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे ॥237॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार मैंने बताया कि भगवान् पुनः किस प्रकार सनातन गोस्वामी से मिले। यह सुनकर मैं भगवान् की इच्छा समझ सकता हूँ। |
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| I have thus described Mahaprabhu's second meeting with Sanatana Goswami. Hearing this, I can understand Mahaprabhu's desire. |
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