श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  3.4.237 
एइ त कहि लुँ पुनः सनातन - सङ्गमे ।
प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे ॥237॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने बताया कि भगवान् पुनः किस प्रकार सनातन गोस्वामी से मिले। यह सुनकर मैं भगवान् की इच्छा समझ सकता हूँ।
 
I have thus described Mahaprabhu's second meeting with Sanatana Goswami. Hearing this, I can understand Mahaprabhu's desire.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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