| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट » श्लोक 235 |
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| | | | श्लोक 3.4.235  | ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा - फल पाइला ।
शास्त्र क रि’ कत - काल ‘भक्ति’ प्रचारिला ॥235॥ | | | | | | | अनुवाद | | नित्यानंद प्रभु की आज्ञा से वे वृन्दावन गये और वास्तव में उनकी आज्ञा का फल प्राप्त किया, क्योंकि उन्होंने दीर्घकाल तक अनेक ग्रन्थों का संकलन किया और वहीं से भक्ति पंथ का प्रचार किया। | | | | By the order of Sri Nityananda Prabhu, he went to Vrindavan and indeed he received the fruits of his order, because for a long time he wrote many books and propagated the Bhakti sect from Vrindavan. | | ✨ ai-generated | | |
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