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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 226
 
 
श्लोक  3.4.226 
‘दान - केलि - कौमुदी’ आदि लक्ष - ग्रन्थ कैल ।
सेइ सब ग्रन्थे व्रजेर रस विचारिल ॥226॥
 
 
अनुवाद
श्रील रूप गोस्वामी ने दानकेलिकौमुदी से आरंभ करते हुए एक लाख श्लोकों का संकलन किया। इन सभी ग्रंथों में उन्होंने वृंदावन की गतिविधियों के दिव्य रसों का विस्तृत वर्णन किया है।
 
Srila Rupa Goswami composed one hundred thousand verses, starting with the Danakelikaumudi. In these scriptures, he elaborately explained the divine essence of the Vrindavan pastimes.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने लक्ष-ग्रंथ ("100,000 छंदों") शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा है कि श्रील रूप गोस्वामी द्वारा लिखे गए छंदों की कुल संख्या 100,000 (एक-लक्ष या लक्ष-ग्रंथ) है। नकल करने वाले संस्कृत कृतियों के छंदों और गद्य दोनों अनुभागों को गिनते हैं। किसी को भी गलती से यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रील रूप गोस्वामी ने 100,000 पुस्तकों का संकलन किया था। उन्होंने वास्तव में सोलह पुस्तकें लिखीं, जैसा कि भक्ति-रत्नाकर की पहली लहर में उल्लेख किया गया है (श्री-रूप-गोस्वामी ग्रंथ षोडश करिला)।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)