श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  3.4.225 
‘विदग्ध - माधव’, ‘ललित - माधव’, - नाटक - मुगल ।
कृष्ण - लीला - रस ताहाँ पाइये सकल ॥225॥
 
 
अनुवाद
श्रील रूप गोस्वामी ने विदग्धा-माधव और ललिता-माधव नामक दो महत्वपूर्ण नाटकों का भी संकलन किया, जिनसे भगवान कृष्ण की लीलाओं से उत्पन्न सभी रसों को समझा जा सकता है।
 
Srila Rupa Goswami also wrote two important plays, Vidagdha Madhava and Lalit Madhava, through which all the rasas obtained from the pastimes of Krishna can be understood.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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