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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  3.4.217 
दुइ भाइ मिलि’ वृन्दावने वास कैला ।
प्रभुर ये आज्ञा, दुँहे सब निर्वाहिला ॥217॥
 
 
अनुवाद
दोनों भाई वृन्दावन में मिले, जहाँ वे श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा पूरी करने के लिए रुके।
 
The two brothers met in Vrindavan, where they stayed to fulfill the wish of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
तात्पर्य:

"श्री चैतन्य-मनो-'भीष्टं स्थपितं येन भू-तले

स्वयं रूपः कदा मम्यां ददात सव पदान्तिकम्"

"श्रील रूप गोस्वामी प्रभु पाद, जिन्होंने भौतिक जगत में भगवान चैतन्य की इच्छा को पूरा करने के लिए मिशन की स्थापना की है, वे मुझे कब अपने चरण कमलों के नीचे आश्रय देंगे?" श्रील रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी पहले नवाब हुसैन शाह की सरकार के सीधे प्रभारी मंत्री थे, और वे गृहस्थ भी थे, लेकिन बाद में वे गोस्वामी बन गए। इसलिए, गोस्वामी कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा को पूरा करता है। गोस्वामी की उपाधि एक विरासत में मिली पदवी नहीं है; यह एक ऐसे व्यक्ति के लिए है जिसने अपनी इंद्रिय तृप्ति को नियंत्रित किया है और अपना जीवन श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश को पूरा करने के लिए समर्पित कर दिया है। इसलिए श्रील सनातन गोस्वामी और श्रील रूप गोस्वामी भगवान की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित करने के बाद वास्तविक गोस्वामी बन गए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)