श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  3.4.197 
पारिषद - देह एइ, ना हय दुर्गन्ध ।
प्रथम दिवसे पाइ लुँ चतुःसम - गन्ध ॥197॥
 
 
अनुवाद
"सनातन गोस्वामी कृष्ण के पार्षदों में से एक हैं। उनके शरीर से कोई दुर्गंध नहीं आ सकती थी। पहले दिन जब मैंने उन्हें गले लगाया, तो मुझे चतुःशम [चंदन, कपूर, अगुरु और कस्तूरी का मिश्रण] की सुगंध आई।"
 
"Sanatana Goswami is one of Krishna's companions. His body cannot smell of any foul odor. The first day I embraced him, I smelled the fragrance of Chatusam (a mixture of sandalwood, camphor, aguru, and musk)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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