श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 191
 
 
श्लोक  3.4.191 
प्रभु कहे, - वैष्णव - देह ‘प्राकृत’ कभु नये ।
‘अप्राकृत’ देह भक्तेर ‘चिदानन्द - मय’ ॥191॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "भक्त का शरीर कभी भौतिक नहीं होता। इसे दिव्य, आध्यात्मिक आनंद से परिपूर्ण माना जाता है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "A devotee's body is never material. He is considered to be full of transcendental, spiritual bliss."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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