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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 184
 
 
श्लोक  3.4.184 
तोमारे ‘लाल्य’, आपनाके ‘लालक’ अभिमान ।
लालकेर लाल्ये नहे दोष - परिज्ञान ॥184॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय हरिदास और सनातन, मैं तुम्हें अपने छोटे बालकों के रूप में मानता हूँ, जिनका पालन-पोषण मुझे करना है। पालनकर्ता कभी भी पालन-पोषण किए गए व्यक्ति के किसी भी दोष को गंभीरता से नहीं लेता।
 
"O Haridasa and Sanatana, I consider you both as my own children, to be raised by me. A guardian never seriously considers the faults of the one he raises."
तात्पर्य
जब एक पिता एक बच्चे का पालन-पोषण करता है और बच्चे का पालन-पोषण पिता द्वारा किया जाता है, तो पिता कभी भी बच्चे की गलतियों को गंभीरता से नहीं लेता है। भले ही वे वास्तव में गलतियाँ हों, पिता को उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)