श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  3.4.181 
हरिदास कहे , - “प्रभु, ये कहिला तुमि ।
एइ ‘बाह्य प्रतारणा’ नाहि मानि आमि” ॥181॥
 
 
अनुवाद
हरिदास बोले, "हे प्रभु, आपने जो कहा है वह बाह्य औपचारिकता है। मैं इसे स्वीकार नहीं करता।"
 
Haridasa said, "My Lord, what you have said is just an outward formality. I do not accept it."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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