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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 179
 
 
श्लोक  3.4.179 
आमि त’ - सन्यासी, आमार ‘सम - दृष्टि’ धर्म ।
चन्दन - पङ्केते आमार ज्ञान हय ‘सम’ ॥179॥
 
 
अनुवाद
"चूँकि मैं संन्यास आश्रम में हूँ, मेरा कर्तव्य है कि मैं कोई भेदभाव न करूँ और समभाव रखूँ। मेरा ज्ञान चंदन के गूदे और गंदी मिट्टी के प्रति समान रूप से समर्पित होना चाहिए।"
 
"Because I am a sannyasi, my duty is not to discriminate, but to have equal vision. My knowledge sees sandalwood and mud equally."
तात्पर्य
एक संन्यासी या त्यागी पुरुष का कर्तव्य है कि वे हमेशा सम रहें, और यही एक विद्वान व्यक्ति और वैष्णव का भी कर्तव्य है। एक वैष्णव, संन्यासी या विद्वान व्यक्ति के पास भौतिक दुनिया की कोई अवधारणा नहीं होती है; दूसरे शब्दों में, उसके पास भौतिक रूप से महत्वपूर्ण किसी भी चीज़ की कोई अवधारणा नहीं होती है। उसे कामुक तृप्ति के लिए चंदन के गूदे का उपयोग करने की कोई इच्छा नहीं है, न ही कामुक तृप्ति उसे कीचड़ से नफरत करती है। भौतिक चीजों को स्वीकार करना या अस्वीकार करना एक संन्यासी, वैष्णव या विद्वान व्यक्ति की चिंता नहीं है। एक उन्नत भक्त को कुछ भी भोगने या अस्वीकार करने की कोई इच्छा नहीं होती है। उसका एकमात्र कर्तव्य कृष्ण भावना की उन्नति के अनुकूल जो कुछ भी है उसे स्वीकार करना है। एक वैष्णव को भौतिक भोग और त्याग के प्रति उदासीन होना चाहिए और उसे हमेशा भगवान की सेवा करने के आध्यात्मिक जीवन की लालसा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)