श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  3.4.177 
विद्या - विनय - सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्व - पाके च पण्डिताः सम - दर्शिनः ॥177॥
 
 
अनुवाद
' 'विनम्र ऋषिगण सच्चे ज्ञान के कारण विद्वान् तथा सज्जन ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते तथा कुत्ते को समान दृष्टि से देखते हैं।'
 
“On the strength of true knowledge, humble sages look at learned and humble Brahmins, cows, elephants, dogs and Chandalas with equal vision.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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