श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 171
 
 
श्लोक  3.4.171 
यद्यपि काहार ‘ममता’ बहु - जने हय ।
प्रीति - स्वभावे काहाते कोन भावोदय ॥171॥
 
 
अनुवाद
“यद्यपि व्यक्ति का स्नेह अनेक व्यक्तियों के प्रति होता है, फिर भी उसके व्यक्तिगत संबंधों की प्रकृति के अनुसार विभिन्न प्रकार के आनंदमय प्रेम जागृत होते हैं।
 
“Although a person may have affection for many persons, different kinds of affection arise according to the nature of their personal relationships.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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