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श्लोक 3.4.157  |
एत शुनि’ महाप्रभु सरोष - अन्तरे ।
जगदानन्दे क्रुद्ध हञा करे तिरस्कारे ॥157॥ |
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| अनुवाद |
| यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु क्रोधित होकर जगदानंद पंडित को डांटने लगे। |
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| Hearing this, Sri Chaitanya Mahaprabhu became angry and started criticizing Jagadananda Pandit. |
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