श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 129-130
 
 
श्लोक  3.4.129-130 
“यद्यपिओ तुमि हओ जगत्पावन ।
तोमा - स्पर्शे पवित्र हय देव - मुनि - गण ॥129॥
तथापि भक्त - स्वभाव - मर्यादा - रक्षण ।
मर्यादा - पालन हय साधुर भूषण ॥130॥
 
 
अनुवाद
"हे सनातन, यद्यपि आप समस्त जगत के उद्धारक हैं और यद्यपि देवतागण एवं महापुरुष भी आपको स्पर्श करके पवित्र हो जाते हैं, फिर भी वैष्णव शिष्टाचार का पालन और उसकी रक्षा करना भक्त का स्वभाव है। वैष्णव शिष्टाचार का पालन भक्त का आभूषण है।
 
"O dear Sanatana, although you are the savior of the entire universe, and even gods and great saints are purified by your touch, it is the virtue of a devotee to observe and preserve Vaishnava etiquette. Maintaining Vaishnava etiquette is the ornament of a devotee."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)