Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.4.127 
“सेवक गतागति करे, नाहि अवसर ।
तार स्पर्श हैले, सर्व - नाश हबे मोर” ॥127॥
 
 
अनुवाद
"नौकर तो बिना रुके आते-जाते रहते हैं। अगर मैंने उन्हें छुआ, तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा।"
 
"Servants are constantly coming and going there. If I were to touch them, I would be ruined."
तात्पर्य
यहाँ यह बहुत स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है कि देवता की पूजा करने वाले पुजारियों को खुद को पूरी तरह से शुद्ध रखने और बाहरी लोगों से नहीं छूने के लिए सावधान रहना चाहिए। सनातन गोस्वामी और हरिदास ठाकुर ने मुसलमानों के साथ अपने पिछले जुड़ाव के कारण खुद को म्लेच्छ और यवन समझा, और इसलिए उन्होंने मंदिर में प्रवेश नहीं किया या मंदिर के गेट के सामने के रास्ते पर आने से भी परहेज किया। भारत में मंदिरों के पुजारियों का बाहरी लोगों को नहीं छूना या छूने के बाद देवता की कोठरी में प्रवेश न करना एक प्रथा है। मंदिर की पूजा में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)