श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  3.4.124 
“तप्त - बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण ।
चलिते ना पार, केमने करिला सहन ?” ॥124॥
 
 
अनुवाद
"गर्म रेत ने तुम्हारे तलवों में छाले डाल दिए होंगे। अब तुम चल नहीं सकते। तुमने ये कैसे सहन किया?"
 
"The hot sand must have blistered your soles. You can't walk anymore. How did you endure it?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)