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श्लोक 3.4.124  |
“तप्त - बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण ।
चलिते ना पार, केमने करिला सहन ?” ॥124॥ |
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| अनुवाद |
| "गर्म रेत ने तुम्हारे तलवों में छाले डाल दिए होंगे। अब तुम चल नहीं सकते। तुमने ये कैसे सहन किया?" |
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| "The hot sand must have blistered your soles. You can't walk anymore. How did you endure it?" |
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