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श्लोक 3.4.118  |
मध्याह्ने समुद्र - बालु हाछे अग्नि - सम ।
सेइ - पथे सनातन करिला गमन ॥118॥ |
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| अनुवाद |
| दोपहर के समय समुद्र तट की रेत आग की तरह गर्म थी, लेकिन सनातन गोस्वामी उस रास्ते से आये। |
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| At noon the sand of the seashore was burning like fire, but Sanatana Goswami came by the same route. |
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