श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.4.102 
आपने आचरे केह, ना क रे प्रचार ।
प्रचार करेन केह, ना करेन आचार ॥102॥
 
 
अनुवाद
“कुछ लोग बहुत अच्छा आचरण करते हैं, किन्तु कृष्णभावनामृत का प्रचार नहीं करते, जबकि अन्य लोग प्रचार तो करते हैं, किन्तु उचित आचरण नहीं करते।
 
“Some people behave very well but do not preach the Krishna consciousness sect, while others preach but do not behave properly.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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