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श्लोक 3.20.80  |
ऐछे महाप्रभुर लीला - नाहि ओर - पार ।
‘जीव’ हञा केबा सम्यक् पारे वर्णिबार? ॥80॥ |
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| अनुवाद |
| श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ असीम आकाश के समान हैं। फिर एक साधारण जीव उन सबका वर्णन कैसे कर सकता है? |
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| The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are like the boundless sky. How can any ordinary being describe them all? |
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