श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.20.61 
एइ राधार वचन, विशुद्ध - प्रेम - लक्षण
आस्वादये श्री - गौर - राय ।
भावे मन नहे स्थिर, सात्त्विके व्यापे शरीर
मन - देह धरण ना याय ॥61॥
 
 
अनुवाद
श्रीमती राधारानी के ये कथन श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अनुभव किए गए कृष्ण-प्रेम के शुद्ध लक्षण दर्शाते हैं। उस आनंदमय प्रेम में, उनका मन अस्थिर था। दिव्य प्रेम के परिवर्तन उनके संपूर्ण शरीर में फैल गए, और वे अपने शरीर और मन को संभाल नहीं पाए।
 
These statements of Srimati Radharani reveal the characteristics of pure Krishna love experienced by Sri Chaitanya Mahaprabhu. In that ecstasy, his mind would become restless. Vibrations of divine love would pervade his entire body, leaving him unable to control his body and mind.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd