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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.20.58 
“कृष्ण - मोर जीवन, कृष्ण - मोर प्राण - धन
कृष्ण - मोर प्राणेर पराण ।
हृदय - उपरे धरों, सेवा क रि’ सुखी करों
एइ मोर सदा रहे ध्यान ॥58॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण मेरे जीवन और आत्मा हैं। कृष्ण मेरे जीवन का खजाना हैं। वास्तव में, कृष्ण ही मेरे जीवन का प्राण हैं। इसलिए मैं उन्हें सदैव अपने हृदय में रखता हूँ और उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता हूँ। यही मेरा निरंतर ध्यान है।"
 
"Krishna is my life. Krishna is the treasure of my life. Indeed, He is the life of my life."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)