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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.20.52 
ना गणि आपन - दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख
ताँर सुख - आमार तात्पर्य ।
मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महा - सुख
सेइ दुःख - मोर सुख - वर्यं ॥52॥
 
 
अनुवाद
"मुझे अपने व्यक्तिगत दुःख की कोई परवाह नहीं। मैं तो केवल कृष्ण के सुख की कामना करता हूँ, क्योंकि उनका सुख ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। फिर भी, यदि मुझे दुःख देने में उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता होती है, तो वह दुःख ही मेरे लिए सर्वोत्तम सुख है।"
 
"I am not concerned about my own suffering. I only wish for Krishna's happiness, because his happiness is the goal of my life. But if he experiences great pleasure in causing me pain, then that pain is my greatest happiness."
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि एक भक्त अपने सुख और दुख की चिंता नहीं करता है। वह केवल यह देखना चाहता है कि कृष्ण प्रसन्न रहें और इस उद्देश्य से वह विभिन्न कार्यकलापों में संलग्न होता है। एक शुद्ध भक्त के पास ख़ुशी महसूस करने का कोई तरीका नहीं है सिवाय इसके कि वह यह देखे कि कृष्ण हर तरह से खुश हैं। अगर कृष्ण उसे कष्ट देकर खुश होते हैं, तो ऐसा भक्त उस दुख को सर्वोच्च खुशी के रूप में स्वीकार करता है। हालाँकि, जो लोग भौतिकवादी हैं, जो भौतिक संपत्ति पर बहुत अधिक गर्व करते हैं और जिनके पास कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, जैसे कि प्राकृत-सहजिया, वे अपने सुख को जीवन का उद्देश्य मानते हैं। उनमें से कुछ कृष्ण की खुशी को साझा करके खुद को खुश करना चाहते हैं। यह फलदायी कर्म करने वाले लोगों की मानसिकता है जो कृष्ण की सेवा का दिखावा करके इंद्रिय सुख का आनंद लेना चाहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)