श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.20.40 
उद्वेगे दिवस ना याय, ‘क्षण’ हैल ‘युग’ - सम ।
वर्षार मेघ - प्राय अश्रु वरिषे नयन ॥40॥
 
 
अनुवाद
"मेरी व्याकुलता में, एक दिन भी समाप्त नहीं होता, क्योंकि हर पल एक सहस्राब्दी के समान प्रतीत होता है। निरंतर आँसू बहाती मेरी आँखें, वर्षा ऋतु के बादलों के समान हैं।
 
"My day is filled with anxiety, for every moment seems like an eternity. My eyes are like rainy clouds from the constant shedding of tears.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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