श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.20.39 
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् ।
शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्द - विरहेण मे ॥39॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रभु गोविन्द! आपसे वियोग के कारण मैं एक क्षण को भी महायुग मानता हूँ। मेरे नेत्रों से वर्षा की धाराओं के समान आँसू बह रहे हैं और मुझे सारा जगत शून्य दिखाई दे रहा है।"
 
"O Govinda, in your separation, a single moment seems like an eternity to me. Streams of tears flow from my eyes like torrents of rain, and I see the whole world as empty."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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