| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ » श्लोक 32 |
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| | | | श्लोक 3.20.32  | अयि नन्द - तनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ ।
कृपया तव पाद - पङ्कज - स्थित - धूली - सदृशं विचिन्तय ॥32॥ | | | | | | | अनुवाद | | हे प्रभु, हे महाराज नन्दपुत्र कृष्ण! मैं आपका नित्य सेवक हूँ, किन्तु अपने ही सकाम कर्मों के कारण मैं इस घोर अज्ञान सागर में गिर पड़ा हूँ। अब मुझ पर अहैतुकी कृपा कीजिए। मुझे अपने चरणकमलों की धूलि का एक कण समझिए। | | | | "O Lord, O Krishna, son of Maharaja Nanda! I am your eternal servant, but because of my own selfish actions, I have fallen into this terrible ocean of ignorance. Now, please bestow your causeless mercy upon me. Consider me a particle of dust at your lotus feet." | | ✨ ai-generated | | |
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