श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.20.30 
“धन, जन नाहि मागों, कविता सुन्दरी ।
‘शुद्ध - भक्ति’ देह’ मोरे, कृष्ण कृपा करि” ॥30॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रिय भगवान कृष्ण, मुझे आपसे न तो भौतिक संपत्ति चाहिए, न ही अनुयायी, न ही सुंदर पत्नी या सकाम कर्मों का फल। मैं केवल यही प्रार्थना करता हूँ कि अपनी अहैतुकी कृपा से आप मुझे जन्म-जन्मांतर तक अपनी शुद्ध भक्ति प्रदान करें।"
 
"O Krishna, I seek neither material wealth, nor followers, nor beautiful women, nor the fruits of fruitive actions. My only prayer is that by your causeless grace, you grant me pure devotion to you in every life.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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