प्रकृत-सहजिया कभी-कभी शुद्ध भक्तों की आलोचना करते हैं, उन्हें दार्शनिक, विद्वान विद्वान, सत्य के ज्ञाता या मिनट पर्यवेक्षक कहते हैं, लेकिन भक्त नहीं। दूसरी ओर, वे खुद को सबसे उन्नत, पारलौकिक आनंदित भक्तों के रूप में चित्रित करते हैं, जो भक्ति सेवा में गहराई से लीन हैं और पारलौकिक भावों का स्वाद लेने के लिए पागल हैं। वे खुद को सहज प्रेम में सबसे उन्नत भक्तों के रूप में, पारलौकिक भावों के ज्ञाता के रूप में, कृष्ण के प्रेम में सबसे ऊपर भक्तों के रूप में वर्णित करते हैं। ईश्वर के प्रेम की पारलौकिक प्रकृति को वास्तव में नहीं जानते हुए, वे अपनी भौतिक भावनाओं को उन्नति का संकेत मानते हैं। इस तरह वे भक्ति सेवा की प्रक्रिया को प्रदूषित करते हैं। वैष्णव साहित्य के लेखक बनने की कोशिश करने के लिए, वे जीवन की अपनी भौतिक अवधारणाओं को शुद्ध भक्ति सेवा में पेश करते हैं। अपनी भौतिक अवधारणाओं के कारण, वे खुद को पारलौकिक भावों के ज्ञाता के रूप में प्रचारित करते हैं, लेकिन वे भक्ति सेवा की पारलौकिक प्रकृति को नहीं समझते हैं।
