| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ » श्लोक 28 |
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| | | | श्लोक 3.20.28  | प्रेमेर स्वभाव - याहाँ प्रेमेर सम्बन्ध ।
सेइ माने , - ’कृष्णे मो र नाहि प्रेम - गन्ध’ ॥28॥ | | | | | | | अनुवाद | | जहाँ कहीं भी भगवान के प्रति प्रेम का सम्बन्ध होता है, वहाँ उसका स्वाभाविक लक्षण यह होता है कि भक्त स्वयं को भक्त नहीं मानता। वरन् वह सदैव यही सोचता है कि कृष्ण के प्रति उसके मन में प्रेम की एक बूँद भी नहीं है। | | | | Wherever love for God is concerned, the natural characteristic is that the devotee does not consider himself a devotee. Rather, he always thinks that he lacks even the slightest love for Krishna. | | ✨ ai-generated | | |
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