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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.20.28 
प्रेमेर स्वभाव - याहाँ प्रेमेर सम्बन्ध ।
सेइ माने , - ’कृष्णे मो र नाहि प्रेम - गन्ध’ ॥28॥
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं भी भगवान के प्रति प्रेम का सम्बन्ध होता है, वहाँ उसका स्वाभाविक लक्षण यह होता है कि भक्त स्वयं को भक्त नहीं मानता। वरन् वह सदैव यही सोचता है कि कृष्ण के प्रति उसके मन में प्रेम की एक बूँद भी नहीं है।
 
Wherever love for God is concerned, the natural characteristic is that the devotee does not consider himself a devotee. Rather, he always thinks that he lacks even the slightest love for Krishna.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि व्यक्ति जो वास्तव में बहुत गरीब हैं क्योंकि उनके पास ईश्वर के प्रेम या शुद्ध भक्ति सेवा की एक बूंद भी नहीं है, वे स्वयं को महान भक्तों के रूप में प्रचारित करते हैं, भले ही वे कभी भी भक्ति सेवा के पारलौकिक आनंद का आनंद नहीं ले पाते। प्रकृत-सहजिया के नाम से जाने जाने वाले तथाकथित भक्तों का एक वर्ग कभी-कभी अपने सौभाग्य को प्रदर्शित करने के लिए भक्ति के लक्षण प्रदर्शित करते हैं। हालाँकि, वे दिखावा कर रहे हैं, क्योंकि ये भक्ति विशेषताएँ केवल बाहरी हैं। प्रकृत-सहजिया कृष्ण के प्रेम में अपनी तथाकथित उन्नति का विज्ञापन करने के लिए इन लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं, लेकिन पारलौकिक परमानंद के अपने लक्षणों के लिए प्रकृत-सहजिया की प्रशंसा करने के बजाय, शुद्ध भक्त उनके साथ जुड़ना पसंद नहीं करते। प्रकृत-सहजिया को शुद्ध भक्तों के साथ समान करना उचित नहीं है। जब कोई वास्तव में कृष्ण के प्रेम में उन्नत होता है, तो वह स्वयं का विज्ञापन करने का प्रयास नहीं करता। इसके बजाय, वह प्रभु की सेवा करने का अधिक से अधिक प्रयास करता है।

प्रकृत-सहजिया कभी-कभी शुद्ध भक्तों की आलोचना करते हैं, उन्हें दार्शनिक, विद्वान विद्वान, सत्य के ज्ञाता या मिनट पर्यवेक्षक कहते हैं, लेकिन भक्त नहीं। दूसरी ओर, वे खुद को सबसे उन्नत, पारलौकिक आनंदित भक्तों के रूप में चित्रित करते हैं, जो भक्ति सेवा में गहराई से लीन हैं और पारलौकिक भावों का स्वाद लेने के लिए पागल हैं। वे खुद को सहज प्रेम में सबसे उन्नत भक्तों के रूप में, पारलौकिक भावों के ज्ञाता के रूप में, कृष्ण के प्रेम में सबसे ऊपर भक्तों के रूप में वर्णित करते हैं। ईश्वर के प्रेम की पारलौकिक प्रकृति को वास्तव में नहीं जानते हुए, वे अपनी भौतिक भावनाओं को उन्नति का संकेत मानते हैं। इस तरह वे भक्ति सेवा की प्रक्रिया को प्रदूषित करते हैं। वैष्णव साहित्य के लेखक बनने की कोशिश करने के लिए, वे जीवन की अपनी भौतिक अवधारणाओं को शुद्ध भक्ति सेवा में पेश करते हैं। अपनी भौतिक अवधारणाओं के कारण, वे खुद को पारलौकिक भावों के ज्ञाता के रूप में प्रचारित करते हैं, लेकिन वे भक्ति सेवा की पारलौकिक प्रकृति को नहीं समझते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)