श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.20.16 
नाम्ना मकारि बहुधा निज - सर्व - शक्तिस् तत्रार्पिता नियमि तः स्मरणे न कालः ।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥16॥
 
 
अनुवाद
“‘मेरे प्रभु, हे भगवान! आपके पवित्र नाम में जीवों के लिए समस्त सौभाग्य समाया हुआ है, और इसीलिए आपके अनेक नाम हैं, जैसे “कृष्ण” और “गोविंद”, जिनके द्वारा आप अपना विस्तार करते हैं। आपने अपनी समस्त शक्तियाँ उन नामों में निवेशित कर दी हैं, और उन्हें स्मरण करने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं। मेरे प्रिय प्रभु, यद्यपि आप उदारतापूर्वक अपने पवित्र नामों की शिक्षा देकर पतित, बद्धजीवों पर इतनी दया करते हैं, फिर भी मैं इतना अभागा हूँ कि पवित्र नाम का जप करते समय अपराध कर बैठता हूँ, और इसीलिए मुझे जप के प्रति आसक्ति प्राप्त नहीं होती।’
 
"O Lord, O Supreme Personality of Godhead, Your holy name contains all the good fortunes for the living being. Therefore, You have many names, such as Krishna and Govinda, through which You expand Yourself. You have filled these names with all Your powers, and there are no fixed rules for remembering them. O Lord, although You bestow such grace upon fallen, conditioned beings by generously teaching them Your holy names, I am so unfortunate that I commit transgressions while chanting the holy name, and therefore, I cannot develop the love for chanting."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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