श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  3.20.157 
शाके सिन्ध्वग्नि - वाणेन्दौ ज्यैष्ठे वृन्दावनान्तरे ।
सूर्याहेऽसित - पञ्चम्यां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः ॥157॥
 
 
अनुवाद
वृन्दावन में 1537 शाकब्द संवत [1615 ई.] में, ज्येष्ठ मास [मई-जून] में, रविवार को, क्षीण चन्द्रमा के पांचवें दिन, यह चैतन्य-चरितामृत पूर्ण हुआ।
 
This Chaitanya Charitamrita was completed in Vrindavan on the fifth day of the dark fortnight in the month of Jyeshtha of Shaka Samvat 1537 (May-June of 1615 AD), on Sunday.
 
इस प्रकार श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य लीला, के अंतर्गत बीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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