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श्लोक 3.20.133  |
भाव - शाबल्ये पुनः कैला प्रलपन ।
कर्णामृत - श्लोकेर अर्थ कैला विवरण ॥133॥ |
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| अनुवाद |
| सत्रहवें अध्याय में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु विभिन्न भावों के संयोग से पुनः उन्मत्त की भांति बोलने लगे तथा उन्होंने कृष्ण-कर्णामृत के एक श्लोक का अर्थ विस्तार से बताया। |
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| The seventeenth chapter also describes Sri Chaitanya Mahaprabhu again raving with a mixture of various emotions and a detailed explanation of a verse from Krishnakarnamrit. |
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