श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  3.20.123 
चतुर्दशे - दिव्योन्माद - आरम्भ वर्णन ।
‘शरीर’ एथा प्रभुर, ‘मन’ गेला वृन्दावन ॥123॥
 
 
अनुवाद
चौदहवें अध्याय में भगवान की आध्यात्मिक समाधि के आरंभ का वर्णन है, जिसमें उनका शरीर जगन्नाथपुरी में था, लेकिन उनका मन वृन्दावन में था।
 
The fourteenth chapter describes the beginning of Mahaprabhu's divine madness, in which his body remained in Jagannath Puri, but his mind was in Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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