श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  3.20.111 
तार मध्ये ‘बाङ्गाल’ - कविर नाटक - उपेक्षण ।
स्वरूप - गोसाञि कैला विग्रहेर महिमा - स्थापन ॥111॥
 
 
अनुवाद
उस अध्याय में यह भी वर्णन है कि किस प्रकार स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने बंगाल के एक कवि के नाटक को अस्वीकार कर दिया और देवता की महिमा को स्थापित किया।
 
In this chapter it is also described how Swarupa Damodar Goswami established the glory of the Archavigraha by rejecting the play of a Bengali poet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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