श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  3.2.98 
स्वरूप कहे, “तथापि मायावाद - श्रवणे ।
“चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या” - एडू - मात्र शुने ॥98॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, "फिर भी, जब हम मायावाद दर्शन सुनते हैं, तो हम सुनते हैं कि ब्रह्म ज्ञान है और माया का जगत मिथ्या है, परन्तु हमें कोई आध्यात्मिक समझ प्राप्त नहीं होती।
 
Svarupa Damodara replied, “Yet when we listen to the Mayavada philosophy, we hear that Brahman is knowledge and the universe of Maya is false, but we do not gain any spiritual knowledge.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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