श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.2.96 
महा - भागवत ये इ, कृष्ण प्राण - धन या र।
मायावाद - श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँ र” ॥96॥
 
 
अनुवाद
"मायावाद दर्शन शब्दों की ऐसी जादूगरी प्रस्तुत करता है कि एक उच्च कोटि का भक्त भी, जिसने कृष्ण को अपना जीवन और आत्मा मान लिया है, वेदांत-सूत्र पर मायावाद भाष्य पढ़ते समय अपना निर्णय बदल देता है।"
 
“The Mayavada philosophy presents such a web of words that even the greatest devotee who has accepted Krishna as his life and soul changes his mind when he reads the Mayavada commentary on the Vedanta-sutras.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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