श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  3.2.85 
सख्य - भावाक्रान्त - चित्त, गोप - अवतार ।
स्वरूप - गोसाञि - सह सख्य - व्यवहार ॥85॥
 
 
अनुवाद
वे भगवान के साथ भ्रातृत्व के भाव में पूरी तरह लीन रहते थे। वे एक ग्वालबाल के अवतार थे, और इसीलिए स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ उनका व्यवहार अत्यंत मैत्रीपूर्ण था।
 
He was immersed in a spirit of friendship with God. He was the incarnation of a cowherd boy and was extremely friendly with Swarupa Damodara Goswami.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)