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श्लोक 3.2.66  |
भोजन देखि’ यद्यपि ताँ र हृदये उल्लास ।
नृसिंह लक्ष्य करि’ बाहो किछु करे दु:खाभास ॥66॥ |
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| अनुवाद |
| यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु को सब कुछ खाते देख नृसिंह ब्रह्मचारी के हृदय में हर्ष हुआ, किन्तु भगवान नृसिंहदेव के लिए उन्होंने बाह्य रूप से निराशा व्यक्त की। |
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| Although Nrisimha Brahmachari felt happy in his heart on seeing Sri Chaitanya Mahaprabhu eating all the things, he outwardly expressed disappointment for Lord Nrisimhadev. |
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