श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.2.65 
नृसिंहेर हैल जानि आजि उपवास ।
ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास ?” ॥65॥
 
 
अनुवाद
"मुझे लगता है कि नृसिंहदेव आज कुछ खा नहीं पाए, इसलिए वे उपवास कर रहे हैं। अगर स्वामी उपवास करेगा, तो सेवक कैसे जीवित रह पाएगा?"
 
"I think Nrisimhadeva couldn't eat anything today, so he's fasting. If the master fasts, how can the servant survive?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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