श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में गौरा-गोपाल मंत्र की व्याख्या की है। श्री गौरसुंदर के उपासक चारों शब्दों गौ-र-अं-ग को गौर मंत्र के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन राधा और कृष्ण के शुद्ध उपासक चारों शब्दों रा-धा-कृ-ष्ण को गौरा-गोपाल मंत्र के रूप में स्वीकार करते हैं। तथापि, वैष्णव श्री चैतन्य महाप्रभु को राधा-कृष्ण से अभिन्न मानते हैं (श्री-कृष्ण-चैतन्य राधा-कृष्ण नाहे अन्य)। इसलिए जो लोग मंत्र "गौरंग" का जाप करते हैं और जो लोग राधा और कृष्ण के नामों का जाप करते हैं, वे एक ही स्तर पर हैं।
