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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.2.31 
‘गौर - गोपाल मन्त्र’ तोमार चारि अक्षर ।
अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥31॥
 
 
अनुवाद
"आप चार अक्षरों वाले गौर-गोपाल मंत्र का जाप कर रहे हैं। अब कृपया अपने भीतर के संशय त्याग दीजिए।"
 
"You chant the four-syllable Gauri Gopal mantra. Now let go of the doubts that reside within your mind."
तात्पर्य
हिंदी पाठः

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में गौरा-गोपाल मंत्र की व्याख्या की है। श्री गौरसुंदर के उपासक चारों शब्दों गौ-र-अं-ग को गौर मंत्र के रूप में स्वीकार करते हैं, लेकिन राधा और कृष्ण के शुद्ध उपासक चारों शब्दों रा-धा-कृ-ष्ण को गौरा-गोपाल मंत्र के रूप में स्वीकार करते हैं। तथापि, वैष्णव श्री चैतन्य महाप्रभु को राधा-कृष्ण से अभिन्न मानते हैं (श्री-कृष्ण-चैतन्य राधा-कृष्ण नाहे अन्य)। इसलिए जो लोग मंत्र "गौरंग" का जाप करते हैं और जो लोग राधा और कृष्ण के नामों का जाप करते हैं, वे एक ही स्तर पर हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)