श्री - रूप - रघुनाथ - पदे यार आश ।
चैतन्य - चरितामृत कहे कृष्णदास ॥172॥
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अनुवाद
श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं, कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन करता हूँ।
Worshiping the lotus feet of Shri Rupa and Shri Raghunath and always seeking their blessings, I, Krishnadas, following in their footsteps, am narrating Shri Chaitanya Charitamrita.
तात्पर्य
इस अध्याय का सारांश प्रस्तुत करते हुए, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि इस अध्याय को पढ़कर हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ ग्रहण करनी चाहिए। (1) भले ही श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, पर उन्होंने अपने एक प्रिय सहयोगी, जूनियर हरिदास, को त्याग दिया। यदि वे ऐसा नहीं करते तो छद्म भक्त जूनियर हरिदास की गलती का फायदा उठाकर भक्त बनने का बहाना बनाते और अवैध यौन संबंध बनाते। इस प्रकार के कार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ का मान मर्दन करते और इस वजह से भक्त निश्चित ही श्री चैतन्य महाप्रभु के नाम पर नारकीय जीवन की ओर चले जाते। (2) जूनियर हरिदास को दंडित करके प्रभु ने आचार्यों, या चैतन्य पंथ का प्रचार करने वाले संस्थानों के प्रमुखों, और सभी वास्तविक भक्तों के लिए एक मानक स्थापित किया। श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वोच्च मानकों को बनाए रखना चाहते थे। (3) श्री चैतन्य महाप्रभु ने निर्देश दिया कि एक शुद्ध भक्त सादा और पापी गतिविधियों से मुक्त होना चाहिए क्योंकि इस तरह से ही व्यक्ति उनके सच्चे सेवक बन सकते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने अनुयायियों को सिखाया कि त्यागमयी जीवन को किस तरह सख्ती से निभाया जाए। (4) श्री चैतन्य महाप्रभु यह साबित करना चाहते थे कि उनके भक्त श्रेष्ठ हैं और उनका चरित्र आदर्श है। वे अपने वफ़ादार भक्तों को कृपा से स्वीकार करते हैं और उन्हें सिखाते हैं कि धार्मिक जीवन के सख्त सिद्धांतों से जरा सी भी विचलन होने पर कितनी तकलीफ और परेशानी पैदा हो सकती है। (5) जूनियर हरिदास को दंडित करके, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके प्रति अपनी दया का प्रदर्शन किया और इस तरह दिखाया कि जूनियर हरिदास का उनके प्रति भक्ति कितनी श्रेष्ठ थी। इस अलौकिक संबंध की वजह से प्रभु ने अपने शुद्ध भक्त द्वारा किए गए एक मामूली अपराध को भी ठीक किया। इसलिए जो लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के शुद्ध भक्त बनना चाहते हैं उन्हें भौतिक इंद्रिय संतुष्टि का त्याग कर देना चाहिए, अन्यथा श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों को प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। (6) यदि व्यक्ति प्रयाग, मथुरा या वृंदावन जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर मरता है तो उसे पापमय जीवन के कर्मों के प्रभावों से मुक्ति मिल सकती है और फिर भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व आश्रय पाता है। (7) भले ही एक शुद्ध या वफ़ादार भक्त पतन कर जाए, फिर भी आखिरकार उसे प्रभु की दया से वापस अपने घर, ईश्वर के धाम पर जाने का मौका मिलता है।
इस प्रकार श्री चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य लीला, के अंतर्गत दूसरा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥