श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  3.2.170 
मधुर चैतन्य - लीला - समुद्र - गम्भीर।
लोके नाहि बुझे, बुझे येइ ‘भक्त’ ‘धीर’ ॥170॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत के समान हैं और सागर के समान अगाध हैं। सामान्यतः लोग उन्हें समझ नहीं सकते, परन्तु एक संयमी भक्त उन्हें समझ सकता है।
 
The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are like nectar and as deep as the ocean. Ordinary people cannot understand them, but a patient devotee can.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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