स्वरूपादि मि लि’ तबे विचार करिला ।
त्रिवेणी - प्रभावे हरिदास प्रभु - पद पाइला ॥166॥
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अनुवाद
तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी के नेतृत्व में सभी भक्तों ने निष्कर्ष निकाला कि चूँकि हरिदास ने गंगा और यमुना नदियों के संगम पर आत्महत्या की थी, इसलिए उन्हें अंततः श्री चैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शरण प्राप्त हुई होगी।
Then all the devotees including Swarup Damodara Goswami concluded that since Haridas committed suicide at the confluence of the rivers Ganga and Yamuna, he must have ultimately found refuge in the lotus feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि कोई त्यागी बनने के बाद, यदि वह संन्यासी या बाबाजी का वेश धारण कर लेता है, और यदि वह इंद्रियतृप्ति के भाव रखता है, विशेषकर स्त्री के संबंध में, तो केवल एक ही प्रायश्चित है कि वह गंगा और यमुना के संगम पर आत्महत्या कर ले। केवल इस प्रायश्चित से ही उसके पापमय जीवन को पवित्र किया जा सकता है। यदि ऐसे व्यक्ति को इस तरह से दंडित किया जाता है, तो उसके लिए श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त करना संभव है। हालांकि, इस तरह के दंड के बिना श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त करना बहुत कठिन है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥