श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  3.2.165 
शुनि’ प्रभु हासि’ कहे सुप्रसन्न चित्त ।
‘प्रकृति दर्शन कैले एइ प्रायश्चित्त’ ॥165॥
 
 
अनुवाद
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने ये विवरण सुने, तो वे प्रसन्न भाव से मुस्कुराये और बोले, "यदि कोई कामुक इरादे से स्त्रियों को देखता है, तो यही प्रायश्चित की एकमात्र प्रक्रिया है।"
 
When Sri Chaitanya Mahaprabhu heard the details, he laughed happily and said, “If someone looks at women lustfully, this is the only method of atonement.”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd