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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  3.2.120 
क्षुद्र - जीव सब मकर् ट - वैराग्य करिया ।
इन्द्रिय चराञा बुले ‘प्रकृति’ सम्भाषिया ॥120॥
 
 
अनुवाद
"बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कम है, फिर भी वे बंदरों की तरह संन्यासी जीवन अपना लेते हैं। वे इधर-उधर भटकते रहते हैं, इंद्रिय-तृप्ति में लीन रहते हैं और स्त्रियों से अंतरंग बातें करते हैं।"
 
"There are many such petty people, without any possessions, who embrace the renunciation of monkeys. They wander about, indulging in sense gratification and intimate intercourse with women."
तात्पर्य
इन्द्रिय-निग्रह के नियमों का सख़्ती से पालन करना चाहिए जैसे: नाजायज़ यौन संबंध, मांसाहारी, नशे की लत और जुआ आदि और इस तरह आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करनी चाहिए। अगर किसी भी अयोग्य व्यक्ति ने भावनात्मक रूप से वैराग्य स्वीकार कर लिया है या संन्यास ले लिया है पर वे महिलाओं के लिए आसक्त बने हुए हैं तो वह बहुत ही ख़तरनाक स्थिति में हैं। उनका त्याग 'मर्कट-वैराग्य' कहलाता है, या बंदर की तरह त्याग। बंदर जंगल में रहते हैं, फल खाते हैं और खुद को कपड़े से भी नहीं ढँकते हैं। इस तरह से वे एक संत की तरह लगते हैं पर बंदर हमेशा मादा बंदरों के बारे में सोचते रहते हैं और कभी-कभी उनमें से दर्जनों के साथ संभोग भी करते रहते हैं। इसे मर्कट-वैराग्य कहा जाता है। इसलिए जो अयोग्य है उसे संन्यासी के जीवन की स्वीकार नहीं करनी चाहिए। जो संन्यास के नियम को स्वीकार करता है पर फिर से शारीरिक इच्छाओं की हलचल से उत्तेजित होता है और महिलाओं से गुप्त बातें करता है उसे धर्म-ध्वजी या धर्म-कलंक कहा जाता है जिसका मतलब है कि वह धार्मिक नियमों को निंदा की ओर ले जाता है। इसलिए इस संबंध में बहुत सावधानी रखनी चाहिए। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने मर्कट का अर्थ 'बेचैन' बताया है। बेचैन इंसान स्थिर नहीं रह सकता; इसलिए वह केवल इधर-उधर भटकता रहता है, अपनी इंद्रियों को तृप्त करता रहता है। दूसरों से प्रशंसा पाने के लिए, अपने अनुयायियों या आम लोगों से सस्ती प्रशंसा पाने के लिए, ऐसे लोग कभी-कभी संन्यासी या त्यागी जीवन में बाबाजी का रूप धारण कर लेते हैं पर वे इंद्रियों की तृप्ति की अपनी इच्छा नहीं छोड़ सकते हैं, ख़ासकर महिलाओं के साथ संगति के लिए। ऐसा आदमी आध्यात्मिक जीवन में आगे नहीं बढ़ सकता है। महिलाओं के साथ आनंद के आठ अलग-अलग प्रकार होते हैं जिसमें उनके बारे में बात करना और उनके बारे में सोचना शामिल है। इसलिए एक संन्यासी, या त्यागी जीवन वाले व्यक्ति के लिए, महिलाओं के साथ अंतरंग रूप से बात करना एक बहुत बड़ा अपराध है। श्री रामानंद राय और श्री नरेंद्र देव ठाकुर ने वास्तव में त्यागी जीवन के सबसे ऊंचे पायदान को हासिल किया पर जो लोग उनकी नकल करते हैं, उन्हें साधारण मानव समझते हैं, भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में आ जाते हैं क्योंकि यह एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)